Home उत्तराखंड स्थानीय उत्पाद हुआ करते थे कालसी की पहचान

स्थानीय उत्पाद हुआ करते थे कालसी की पहचान

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जनपद देहरादून से करीब 55 किमी की दूरी पर स्थित है विकास खण्ड कालसी। देहरादून से चकराता रोड होकर सेलाकुई, हरर्बटपुर और विकासनगर के बाद यमुना पुल पार कर कालसी पुहंचा जा सकता है। इस विकास खण्ड के अंतर्गत करीब 168 गांव हैं। अभिव्यक्ति सोसाइटी के एक टीम ने 12 फरवरी, 2017 को कालसी ब्लाॅक मुख्यालय से लेकर सहिया तक करीब 19 किमी की दूरी तक के बीच स्थित दर्जनों गांवों की जीवन शैली और उनकी समस्याओं को जानने का प्रयास किया।

एक जमाने में इस क्षेत्र की पहचान कृषि प्रधान क्षेत्र के रूप में थी। आलू, अदरक, हल्दी आदि यहां के प्रमुख उत्पादों में शामिल थे। समय के साथ तेजी से आ रहे पर्यावरणीय बदलाव के चलते पूरी तरह से बारिश पर निर्भर यहां की खेतीबाड़ी अब कल की बात लगने लगी है।

        प्रमुख समस्यायें -:

सिंचाई की अनुपलब्धता -:

विकास खण्ड कालसी के अंतर्गत आने वाले गांव चापनू के चमन सिंह, निर्मला, गोपाल, विकास आदि का कहना है कि एक जमाना था जब क्षेत्र का तकरीबन हर परिवार खेतीबाड़ी के व्यवसाय से जुड़ा था, लेकिन अब सिंचाई की कमी इस राह में सबसे बड़ी बाधा बन गई है जिससे लोगों के आगे आर्थिकी की समस्या पैदा हो गई है। उन्होंने बताया कि अपनी खेती की जमीन होने के बावजूद सिंचाई की व्यवस्था न होने के कारण लोग गांव से पलायन करने को मजबूर हंै। उन्होंने बताया कि कुछ लोग अपने बंजर खेतों में फसल उगाने की हिम्मत जुटाते हैं, लेकिन जंगली जानवर उनकी फसल को रौंदकर उनकी मेहनत और उत्साह को निराशा में बदल देते हैं।
लिंक मार्गों की हालत है बदहाल -:
क्षेत्रवासियों के अनुसार लंबे समय के इंतजार के बाद कालसी से चकराता मार्ग के हालात अब सुधर चुके हैं हांलाकि बरसात के सीजन में कुछ स्थानों पर भूस्खलन होने के कारण यातायात प्रभावित हो जाता है। वहीं उन्होंने बताया कि मुख्य सड़क से गांवों को जोड़ने वाले ज्यादातर पैदल लिंक मार्गों की हालत बदहाल है।
स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव
क्षेत्र के गांवों में महिलाओं और बच्चे स्वास्थ्य सुविधाओं से महरूम हैं। कुछ गांवों में महिलाओं ने बताया कि बीमार होने की हालत में विकासनगर या देहरादून के अस्पतालों में जाना पड़ता है। छोटी-मोटी बीमारी का इलाज गांव में पुराने तरीकों के इस्तेमाल से कर लिया जाता है। प्रसूति के समय महिलाओं को स्थानीय महिलाओं के भरोसे ही रहना पड़ता है।

शिक्षा -:
क्षेत्र अधिकतर गांवों में प्राईमरी और जूनियर हाईस्कूल तक के सरकारी स्कूल उपलब्ध हैं, लेकिन उच्च शिक्षा के लिए छात्रों को विकासनगर और देहरादून ही आना पड़ता है।
बिजली
पूरे क्षेत्र में बिजली की व्यवस्था है, लेकिन बिजली का इस्तेमाल व्यावसायिक कुटीर उद्योगों के रूप में नहीं किया जा रहा है।
पेयजल
गदेरों व कुछ गांव में नदी के पानी से प्यास बुझाई जाती है। साफ-सफाई की जागरूकता के अभाव के चलते बीमारी फैलने का खतरा बना रहता है।
          महिलाओं की स्थिति -:
सहिया से आगे खतासा गांव के गोपाल वर्मा ने बताया कि क्षेत्र की महिलाओं जागरूकता का अभाव है। जिसके चलते वह अपने अधिकारों और आत्मनिर्भर बनने के सपने से अभी कोसोें दूर हैं। निर्मला, सूपा, चम्मो देवी आदि ने बताया कि कई गांवों में घरों में शौचालय की व्यवस्था न होने के कारण महिलाओं को जंगल जाना पड़ता है। स्वच्छता अभियान को लेकर भी कोई खास जागरूकता देखने को नहीं मिली।
जानकारी का अभाव कर रहा गुमराह:
चापनू गांव में महिलाओं से बातचीत के दौरान उनसे स्वयं सहायता समूह के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि जानकारी के अभाव में पूर्व में उन्हें कुछ लोगों द्वारा समूह बनाने के नाम पर गुमराह किया गया। बैंक में खाता नहीं खोला गया और कुछ महीनों तक समूह के पैसे जमा करवाने के बाद वे गायब हो गए।
सुरक्षा को लेकर भय:
कालसी से मुख्यमार्ग पर सड़क के किनारे पशुओं के लिए जंगल से चारा पत्ती लेकर आ रही किरन, कृष्णा, विमला आदि युवतियों से जब दल के सदस्यों ने बातचीत की तो कुछ चैंकाने वाले तथ्य सामने आए। युवतियों ने बताया कि पहले तो वे उन्हें देखकर स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगीं। उनका कहना था कि नए जमाने और बाहरी लोगों को देखकर वह डर जाती हैं क्यों कि पता नहीं उसकी नीयत कैसी हो। युवतियों का कहना था कि अपनी सुरक्षा कैसे की जाए यह बात उनके लिए एक बड़ा सवाल है।

 

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