उत्तराखंड

थर्ड गढ़वाल राइफल स्थापना दिवस (20 अगस्त) : बटालियन के पराक्रम को किया याद

देहरादून। भारतीय सेना में गढ़वाल राइफल का इतिहास पराक्रम और वीरता का प्रतीक रहा है। देहरादून में गढ़वाल राइफल की थर्ड बटालियन का 102वां स्थापना दिवस बटालियन के सेवानिवृत्त अफसरों व जवानों ने यादगार रूप में मनाया। विश्व युद्ध के दौरान 3 गढ़वाल राइफल के जवानों ने अफ्रीका में युद्ध कौशल और बहादुरी के साथ लड़ाइयां लड़ी। इनमें कुछ ऐतिहासिक युद्ध “गलाबात’ (सूडान) “वारेन्ट’ “केरीन’ “मस्सावा’ और “अम्बा अलागी’ इटालियनों के विरुद्ध लड़े गए। यूनिट को इन युद्ध सम्मानों से भी नवाजा गया।

सोमवार को गढ़वाल राइफल की थर्ड बटालियन के स्थापना दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान सेवानिवृत्त कैप्टन बलवीर सिंह ने बताया कि 3 गढ़वाल राइफल को सेना में महान थर्ड के नाम से भी जाना जाता है। बटालियन की स्थापना लैंसडौन में की गई थी। ले.कर्नल जेएमटी हौग बटालियन के पहले कमान अफसर थे। 1918 में बटालियन अफगान युद्ध में शामिल हुई और वीरता के लिए बटालियन को सम्मानित किया गया। बटालियन ने अफ्रीकी देशों में तैनाती के दौरान गलाबात, केरीन, मास्सावा, इरीटीरिया और अम्बा अलागी आदि स्थानों पर अपना लोहा मनवाया और सम्मान हासिल किए। 1940 में बटालियन ने गलाबाद के किले पर फतह हासिल इतावली सैनिकों को वहां से खदेड़ा।

1947 में आजादी के बाद कश्मीर में पाकिस्तानी सैनिकों ने घुसपैठ करनी शुरू की तो 3 गढ़वाल राइफल ने 163 इन्फेंट्री ब्रिगेड के साथ मिलकर कमान अफसर ले.कर्नल कमान सिंह पठानिया के नेतृत्व में टिथवाल, चौकीवाल आदि स्थानों से पाकिस्तानी सेना के घुसपैठियों को वहां से खदेड़ा। 1953 में बटालियन ने उत्तरी कोरिया में भारत की ओर से शांति सेना का दायित्व भी बखूबी निभाया।

गढ़वाल राइफल की थर्ड बटालियन को अपने शौर्य व पराक्रम के लिए 1 महावीर चक्र, 18 वीर चक्र, 2 शौर्य चक्र, 19 मेनशन इन प्राप्त हैं। कार्यक्रम के दौरान बटालियन के पूर्व अफसरों और जवानों ने यादों को साझा किया।

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