मुहावरों के साथ जीवित रहती है भाषा : सुमित्रा जुगलान
दून स्थित स्मृतिवन में संपन्न हुआ मातृभाषा दिवस

डीबीएल संवाददाता / देहरादून।
देहरादून के स्मृतिवन में धाद संस्था के तत्तवावधान में आयोजित अंतराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का समापन गढ़वाली मुहावरे और खानपान के साथ सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर गढ़वाली औखाण की लेखिका सुमित्रा जुगलान ने कहा भाषा उसके मुहावरों के साथ जीवित रहती है, जो कई पीढ़ीयो तक मौखिक परम्परा के रूप मे जीवित रहते है। हमारी मातृभाषा मे ऐसे सैकड़ों आणा है जो उसे जीवंत बनाये हुए है। उन्होंने उनको संकलित करते हुए दस्तावेज के रूप मे तैयार किया है ताकी वो आने वाली पीढ़ीयों के लिए जीवित रहे।
इस अवसर पर संस्कृतिकर्मी शांति बिंजोला ने बताया कि धाद मातृभाषा एकांश ने इस वर्ष भाषा बच्यायो के साथ अपनी मातृभाषाओ के संवाद के कार्यक्रम का संचालन करने का तय किया है जिसमें नयी के साथ वर्तमान पीढ़ी को भी उनकी मातृभाषा सीखने को मिलेगी।
हिमांशु आहूजा ने बसंत फ़ूड फेस्टिवल के बारे में जानकारी दी कि पहाड़ के परंपरागत भोजन परम्परा की पहल का मकसद इसे लोगों के आहार मे स्थापित करना है। इस दौरान बलबीर कैंतुरा, प्रदीप डिमरी, अखिल पाँथरी, कर्नल नरेंद्र बिष्ट, बीना रावत, सुशील पुरोहित ने भी पहाड़ी मुहावरे सुनाते हुए अपनी बात रखी।
इस अवसर पर आशुतोष शर्मा, डॉ धर्मेंद्र भट्ट, पूर्णिमा गैरोला, अनूप जखमोला, सुनील आशुतोष शर्मा, डॉ. धर्मेंद्र भट्ट, पूर्णिमा गैरोला, अनूप जखमोला, सुनील अग्गरवाल, कौतुक सक्सेना, चंद्र बहादुर रसाइली, उषा नौटियाल, मीता नौटियाल, मंजू बिष्ट, घनश्याम कांडपाल, दयानंद डोभाल, मदन सिंह रावत, जगजीत सिंह रावत, कौतुक सक्सेना, अरुण ढांड,चंद्र बहादुर रसाइली, उषा नौटियाल, मंजू बिष्ट, घनश्याम कांडपाल, दयानंद डोभाल, मदन सिंह रावत, बीना रावत आदि मौजूद रहे।



