भारत का राष्ट्रीय पशु: बंगाल टाइगर का संरक्षण और हमारी जिम्मेदारी पर किया जागरूक
दून पुस्तकालय में राष्ट्रीय पशु दिवस के अवसर पर युवा पीढ़ी के लिए बाघ संरक्षण पर शैक्षिक कार्यक्रम आयोजित

डीबीएल संवाददाता / देहरादून।

राष्ट्रीय पशु दिवस के अवसर पर दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र देहरादून की ओर से छात्रों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं प्रकृति प्रेमियों के लिए ‘भारत का राष्ट्रीय पशु: बंगाल टाइगर का संरक्षण और हमारी जिम्मेदारी’ विषय पर एक विशेष शैक्षिक एवं जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में युवाओं को चित्रात्मक तरीके से महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की गई। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. सुरजीत सिंह खैरा ने कहा कि कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी में वन्यजीव संरक्षण, जैव विविधता, पर्यावरणीय संतुलन तथा प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण विकसित करना है।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता भूगोलवेत्ता डॉ. सुरजीत सिंह खैरा ने अपने व्याख्यान में कहा कि बंगाल टाइगर केवल भारत का राष्ट्रीय पशु नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक समृद्धि, शक्ति और गौरव का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि प्राचीन भारतीय साहित्य, लोककथाओं, कला और ऐतिहासिक अभिलेखों में बाघ का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त पुरावशेषों में भी बाघ की आकृतियाँ मिलती हैं, जो भारतीय संस्कृति से उसके प्राचीन संबंधों को दर्शाती हैं। डॉ. खैरा ने कहा कि बाघ वन पारिस्थितिकी तंत्र का शीर्ष शिकारी है और इसकी उपस्थिति स्वस्थ वनों का संकेत मानी जाती है। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने बाघ संरक्षण, राष्ट्रीय उद्यानों, टाइगर रिजर्व, वन्यजीव संरक्षण कानून तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कुछ प्रश्न भी पूछे, जिनका डॉ. खैरा ने सरल एवं वैज्ञानिक ढंग से उत्तर दिया। इस संवादात्मक सत्र ने विद्यार्थियों में विषय के प्रति विशेष उत्साह और रुचि उत्पन्न की।
डॉ. खैरा ने कहा कि बाघों की रक्षा केवल एक वन्य जीव को बचाने का अभियान नहीं है, बल्कि भारत के वनों, जल स्रोतों, जैव विविधता, पर्यावरणीय संतुलन और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की रक्षा का राष्ट्रीय दायित्व है। उन्होंने सभी विद्यार्थियों से प्रकृति संरक्षण का संदेश अपने परिवार और समाज तक पहुँचाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में, कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी, पुस्तकालयाध्यक्ष, डीके पाण्डे, जय भगवान गोयल, सुंदर सिंह बिष्ट सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
विश्व स्तर पर उल्लेखनीय सफलता :
उन्होंने बताया कि विश्व के आधे से अधिक जंगली बाघ भारत में पाए जाते हैं, इसलिए उनके संरक्षण की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी भारत पर है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1972 में बाघों की संख्या घटकर लगभग दो हजार रह जाने के बाद भारत सरकार ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 लागू किया तथा वर्ष 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में प्रोजेक्ट टाइगर प्रारम्भ किया गया। इन प्रयासों का परिणाम है कि आज भारत में बाघों की संख्या बढ़कर 3,682 तक पहुँच चुकी है, जो विश्व स्तर पर संरक्षण की एक उल्लेखनीय सफलता मानी जाती है।



